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सुकून ढूँढते लोग। एक मुट्ठी सुकून। कविता। Hindi Poem

एक मुट्ठी सुकून  

एक मुट्ठी सुकून के लिए
महीने कर्ज़ कर रहे हैं लोग

शांत हैं पर मौन आँखें हैं बोलती
हर एक नज़र दर्ज़ कर रहे हैं लोग

पीर मिटाने दिया था मरहम
जिन हाथों को यकीन से
उन हाथों में शोले देख
अब हर्ज़ कर रहे हैं लोग

जिस वृक्ष को सींचने
छोड़ा था अपना काफ़िला
आज अधूरा छोड़ उसे
खुद राही फ़र्ज़ कर रहे हैं लोग

यहाँ महफिलों की शान की
अब बात नहीं रही 'गुंजन'
नया वृक्ष तलाशो सींचने, जहाँ
स्वच्छन्द अर्ज़ कर रहे हैं लोग


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