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क्या बोलना मना है? (कविता)

क्या बोलना मना है? क्या बोलना मना है? हाँ???? क्या बोलना मना है? बोलना मना है या फिर....... उस जगह  हाँ उस जगह..... जहाँ तुम बोल रहे हो  अपना दिल खोल रहे हो  बोल-बोलकर ही अपना दिल टटोल रहे हो  वहाँ बोलना मना है  हाँ वहाँ बोलना मना है  हाँ वहाँ बोलना मना है  वो बहुत अच्छा है  तुम्हारे साथ बहुत सच्चा है  लेकिन तुम्हें पूरी तरह समझने में  तुम्हें तुम्हारा पूरा अस्तित्व देने में  अभी वो कच्चा है  ना वो नासमझ है  ना ही वो बच्चा है  तो क्या करें..... तो फिर क्या करें थोड़ा सहते रहें??? ख़ुद का दर्द ख़ुद ही कहते रहें??? या फिर.... या फिर समय की जो धारा है  ये जो नाज़ुक सा रिश्ता हमारा है  जो हमें सबसे अजीज़ सबसे प्यारा है  उसके साथ, समय के साथ बस  यूँ ही बहते रहें??? अगर बस यूँ ही बहते रहे  तो भी बड़ी परेशानी होगी  हमारे साथ बहने में  आँसुओं के बहने की भी कहानी होगी  और जो ये कुछ पल की मिली है  वो कैसी उदासी भरी ज़िंदगानी होगी तो फिर....... तो क्या करना होगा? सहना होगा? या डरना हो...