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कूप संसार या ऊँची उड़ान

कूप संसार या ऊँची उड़ान 

हमारी सीमाएँ कहाँ किसी ने तय की 

हमें तो असीमित आकाश में उड़ना था 

कल्पनाओं से ज़्यादा हमें आगे बढ़ना था 

फिर कैसे अचानक यहीं से-कहीं से 

किसी मेंढक ने प्रवेश किया कहीं से 

शुरू किया फिर सीमा बनाना 

अपने लोगों को आपस में भिड़ाना 

कहीं छोटी सी चिंगारी लगाकर 

फिर घी डाल-डाल आग लगाना 

कि इच्छा थी उसकी 

सभी कूप मंडूक बनेंगे 

देखें कि कैसे वो आगे बढ़ेंगे 

तब समझा नहीं कोई-जाना नहीं कोई 

उसका ये खेल पहचाना नहीं कोई 

फिर मेंढक ने अपने-से मेंढक बनाए

काम था उनका कि कोई उड़ने न पाए 

कहीं आगे बढ़ता कोई देखा जाए 

करो पूर्ण प्रयास कि वहीं थम जाए 

बढ़ता हुआ गर देखो किसी को 

तभी तत्क्षण उसकी टाँग खींची जाए 

फिर क्या था………

मेंढकों की संख्याएँ बढ़ने लगी 

आकाश उड़ाने फिर घटने लगीं 

सभी ने फिर कूप को संसार माना 

ख़ुद को सीमित सा, संकुचित सा जाना 

अब क्या हाल है……

अब का हाल बहुत ही बुरा है 

सड़ा है, गला है या मर ही गया है 

सीलन-सी ज़िंदगी जिए जा रहे हैं 

ये खींचतान का विष पिए जा रहे हैं 

उड़ानें बढ़ाने कोई न आएगा 

तू कुछ करेगा तभी कुछ पाएगा 

ये कूप-मंडूक की दुनिया को छोड़ 

सीधे लक्ष्य की ओर नज़रें तो मोड़

प्रयासपंखों की लंबी उड़ान होगी 

कैसी अलग सी वो पहचान होगी 

सबसे अलग सी वो पहचान होगी। 

प्रयासपंखों की लंबी उड़ान होगी 

सबसे अलग सी वो पहचान होगी। 

सबसे अलग सी वो पहचान होगी। 


 


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