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भ्रष्ट कुर्सियाँ-भ्रष्टाचार-कविता


बरसों की छिपी ख्वाइशें मानो,
एक साथ निकलती हैं 
स्वयं की मुस्कुराहटों में,  न जाने 
कितनी आँखें विकलती हैं 
एक ग़ुरूर, एक नशा घिरता है चारों ओर 
फिर कुर्सियाँ कहाँ सँभलती हैं 

- खुद ऊँचे, बाक़ी नीचे 
अचानक नज़र आने लगते हैं 
अपना रुतबा, अपना ज़ोर 
आज़माने लगते हैं 
दूसरों का हक़ लेने को-
उँगलियाँ मचलती हैं 
फिर कुर्सियाँ कहाँ सँभलती हैं 

कोई अपना हक़ माँग ले तो 
नज़रों में हीनता दिखाई जाती है 
मानव की नज़रों में मानवता 
गिराई जाती है
छल-कपटता आँखों में चमकती है
फिर कुर्सियाँ कहाँ सँभलती हैं

@गुंजन राजपूत

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