स्वार्थ
रह-रह के उठ रहा है मन मस्तिष्क में प्रश्न मेरे
ये कैसी शिक्षा हमने पाई है
कभी उजाड़ दिए खुद ही के लिए जंगल-वन
तो कभी प्रकृति में आग लगाई है
कामयाबी की बुलंदी इतनी कि
चाँद और मंगल की कम पड़ गई ऊँचाई है
रह-रह के उठ रहा है मन मस्तिष्क में प्रश्न मेरे
ये कैसी शिक्षा हमने पाई है
सागर सुखाए, पर्वत छाँटे वृक्षों की करी कटाई है
ये कैसी शिक्षा है जिससे जीवों की जान पे बन आई है
अब हो गए हैं कैद खुद ही के बनाए पिंजरों में
पर ये भी शायद कम रहा क्योंकि अकल अभी न आई है
रह-रह के उठ रहा है मन मस्तिष्क में प्रश्न मेरे
ये कैसी शिक्षा हमने पाई है
दीवाली पर ग्रीन दीवाली का ढोंग कर रहे
फिर ग्रीनरी में ही आग लगाई है
अभी तक मर रहे थे गर्भ में बच्चे
अब गर्भ सहित माँ ने भी जान गंवाई है
रह-रह के उठ रहा है मन मस्तिष्क में प्रश्न मेरे
ये कैसी शिक्षा हमने पाई है
वनस्पतियों में बम फूट रहे
और कहते हैं हमें भूख से मौत हो आई है
सब नष्ट करने की ये कैसी होड़ मची है यहाँ
लगता है मानव सभ्यता अब खतम होने पे आई है
रह-रह के उठ रहा है मन मस्तिष्क में प्रश्न मेरे
ये कैसी शिक्षा हमने पाई है
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