आपका चुप रहना आपकी कमजोरी नहीं आपकी ताक़त हो तो अच्छा है। कई कारण ऐसे हो जाते हैं जब आप बहुत कुछ बोलना चाहते हैं लेकिन किसी मजबूरी के कारण आप बोल नहीं पाते उस समय जो घुटन महसूस होती है उसे सिर्फ वही जान सकता है जो इसे महसूस कर सकता है।
कई बार ऐसा भी होता है कि बोलने का बहुत कुछ होता है आपके पास लेकिन आपको पता है कि आपकी बात का वहाँ कोई महत्त्व नहीं है अथवा वहाँ आपकी बात बोलने से बात खराब हो सकती है अथवा वहाँ जो स्वयं को बुद्धिमान समझने वाले लोग बैठे हैं वहाँ आपकी बात का कोई स्थान नहीं
ऐसा सोचकर आप जब स्वयं की मर्ज़ी से शांत होते हैं। तब वो आपकी मजबूरी नहीं आपकी ताक़त होती है।
आपके चुप रहने को लोग आपकी कमजोरी समझ सकते हैं। लेकिन ये पूरी तरह से आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप उसे अपनी कमजोरी बना रहे हैं अथवा ताक़त।
शब्द बहुत ज़रूरी होते हैं। यहाँ चुप रहने पर या बोलने पर किसी भी बात पर कोई pressure नहीं है। शब्दों के माध्यम से ही तो आप अपनी बात दूसरों तक पहुँचाते हैं लेकिन समस्या तब है जब आपका आपके शब्दों पर पूरी तरह से नियंत्रण हो।
यदि सही शब्द बोलने में समस्या है तो बुरे शब्द बोलने से पहले क्यूँ न एक बार चुप रह कर देख लें?
शब्दों पर नियंत्रण आपके गुस्से (क्रोध) पर नियंत्रण से ही आएगा। शुरुआत में थोड़ी परेशानी होगी लेकिन जब तक try नहीं करेंगे तब तक पता कैसे चलेगा कि किसमें कितनी ताक़त है अपने शब्दों को नापने-तौलने की।
आपका गुस्सा करना अथवा बात-बात पर नाराज़ होना- किसी भी तरह से आपको ताकतवर या सबसे सही नहीं साबित करता। किंतु आपका शांत रहना कई बार लोगों के दिल पर गहरी छाप छोड़ता है।
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