प्रकृति की विशेषता बताते हुए लिखी गई मेरी एक छोटी सी कविता
ये प्रकृति
जन्म से ले मृत्यु तलक हमें गोद में खिलाती है
माँ-पिता-गुरू-ईश से मिल ये प्रकृति कहलाती है
कभी दुलार, कभी दहाड़, कभी सीख ये सिखाती है
माँ-पिता-गुरू-ईश से मिल ये प्रकृति कहलाती है
जीव-प्रकृति अनादि हैं अनन्त है
गुरूर कर इस पर कहाँ ये इतराती है
मनु-पशु-विहग की माँगें पूर्ण करती
ये प्रकृति पिता का किरदार निभाती है
कभी झुलसते तन को देख शीतल
बौछारें बन गिर जाती है
कभी ठिठुरते प्राणी को देख
सुनहरी धूप सी झिलमिलाती है
कभी फल-पुष्प से लाद
वनस्पतियाँ ये खिलाती है
कभी लता का भार कम करने को
पतझड़ बन सब सूना कर जाती है
समय-समय पर अपने बच्चों को देख
फिक्रमंद सी माँ बन जाती है
माँ-पिता-गुरू-ईश से मिल ये प्रकृति कहलाती है
@गुंजन राजपूत (2020)
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